Dr Satinder Maken
बुढ़ापा एकांत का नहीं, अनुभव का उत्सव हो
यदि आप एक पेड़ को पोषण देना चाहते है तो उसके हर पत्ते को पानी या खाद देने की जरुरत नहीं होती | आप सिर्फ पेड़ की जड़ की फ़िक्र करो | उसे खाद पानी दो बाकी काम अपने आप हो जायेगा | इसी तरह किसी भी समस्या का अगर आप हल करना चाहते है तो उस समस्या के प्रभाव को कम करने की कोशिश करने से वो समस्या कभी भी हल नहीं होगी इसके बजाये आप ये ढूंढे कि उस समस्या का मूल कारण क्या है और उस मूल कारण को ढूंढ कर सिर्फ उसे ही हल कर लिया जाये तो समस्या खत्म हो सकती है |
आज इस लेख में जिस समस्या का जिक्र मैं कर रही हूँ वो है बजुर्गो की हालत से सम्बंधित है जब भी हम बूढ़े लोगो की समस्या के बारे में बात करते है तो बड़ी आदर्शात्मक बातें कही जाती है कि बुजुर्गों से बातचीत करें, उन्हें सुने, समय दें। वे क्लब, मंदिर जाएँ बुजुर्गों को तकनीक सिखाएं ताकि वे व्हाट्सएप, वीडियो कॉल, फेसबुक के ज़रिए दुनिया से जुड़ सकें। बुजुर्गों को सलाहकार, मार्गदर्शक बनाएं उन्हें यह महसूस हो कि वे आज भी उपयोगी हैं। बच्चों को शुरू से सिखाएं कि दादा-दादी, नाना-नानी सिर्फ बूढ़े लोग नहीं, अनुभव का खजाना हैं। इतियादी इतियादी | सरकार और समाजसेवी संस्थाएं उनके लिए वृद्धाश्रम बनवा रही है जहाँ वो अपने अंतिम दिन काट सकें | वास्तव मे ये समस्या का हल नहीं है ये है सब पतों को पानी देने की बात |
प्रश्न ये है कि ये बुजुर्ग अकेले हुए कैसे ? इसका कारण मेरे देखे यह है कि अपनी युवावस्था में उन्होंने सही से निवेश नहीं किया | यहाँ मै आर्थिक निवेश की बात नहीं कर रही | मैं बात कर रही हु सामाजिक निवेश की | समाज में अपने योगदान की | कैसे ? ये आपको इस लेख में पता चलेगा |
वास्तव में बुढ़ापा आज केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह गया है, यह एक सामाजिक विफलता का दर्पण बन चुका है। यह वह अवस्था है जहाँ किसी व्यक्ति को सबसे ज़्यादा भावनात्मक समर्थन, सुरक्षा और अपनापन चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश, वह सबसे ज़्यादा उपेक्षा, तिरस्कार और अकेलापन झेलता है।
आज की सबसे भयावह सच्चाई यह है कि बुज़ुर्गों को सिर्फ अकेला नहीं छोड़ा जा रहा, उन्हें त्यागा जा रहा है। यह त्याग सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक परित्याग का रूप ले चुका है।
जब सिनेमा सच के करीब होता है
फिल्में जैसे “वनवास” और “कालीधर लापता” इस सच्चाई को और उजागर करती हैं। दोनों में दिखाया गया है कि जैसे ही बुज़ुर्गों को भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) होती है, उन्हें धार्मिक मेलों, तीर्थ स्थलों पर इस उम्मीद से अकेला छोड़ दिया जाता है कि वे लौट न सकें। यह समाज के उस अंधकार को दिखाता है जहाँ बुज़ुर्ग एक मुसीबत समझे जाने लगते हैं, न कि संपदा । डिमेंशिया जैसी बीमारियाँ अब केवल मेडिकल कंडीशन नहीं रहीं | वे अमानवीय व्यवहार का औचित्य बन गई हैं। लोग कहते हैं, “उन्हें कुछ याद नहीं रहता, उन्हें क्या फर्क पड़ेगा?” यह मानसिकता केवल असंवेदनशील नहीं, खतरनाक है। यह संकेत करती है कि हम भावनात्मक रिश्तों को भी अब याददाश्त और उपयोगिता के आधार पर आंकने लगे हैं।
असल घटनाएँ: एक गरीब, एक अमीर — दोनों अकेले
इस त्रासदी की पुष्टि दो सच्ची घटनाएँ करती हैं:
पहला मामला जो मेरे अपने एक कुलीग का है, जिनकी पहले नौकरी गयी फिर स्वास्थ्य ख़राब हुआ, आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब हो गयी | जहाँ पहले गांवों से कोई दिल्ली आता तो डेरा उन्ही के घर लगता | एक आता दूसरा जाता लेकिन जैसे ही दिन बदले दोस्त, रिश्तेदार यहाँ तक कि सगी बहन भी बदल गयी | धोखे से माँ बाप का पैसा भी बहन ने हथिया लिया | अस्पताल में आखिरी समय में अकेले रहे उनके आखिरी शब्द थे कि पैसा बहुत बड़ी चीज़ है |
वहीँ एक दूसरा मामला भी मैंने अगले दो महीने में देखा जब एक बहुत ही नज़दीकी व्यक्ति जिसके पास खूब पैसा था, दिल का दौरा पड़ा, लेकिन इलाज में बच्चों ने इसलिए कोताही की ताकि वो जल्दी दुनिया से विदा हो ताकि उनकी प्रॉपर्टी और पैसा जल्दी से उन्हें मिल जाये | मैं स्तब्ध थी
एक पैसे की कमी से विदा हुए और दूसरे पैसे की अधिकता से | इन दोनों घटनाओं को देख कर मैंने समझ लिया बात धन की नहीं है समस्या कहीं और है |
प्रश्न ये है कि कैसे इस समस्या का हल हो | कैसे उम्र के इस पड़ाव को सही तरीके से जिया जाये | कैसे बजुर्ग लोग अपने आत्म सम्मान के साथ जीवन के अंतिम पड़ाव को पार करें और इज्जत से इस दुनिया से कूच करें?
मेरे समझे इस समस्या का हल हमारे समाज के ताने बाने में ही है |
जीवन का एक आयामी दृष्टिकोण
अधिकांश लोग अपने पूरे जीवन की ऊर्जा सिर्फ अपने बच्चों पर केंद्रित कर देते हैं। पहले बच्चे छोटे है, अब बच्चे पढ़ रहे है उनको उच्च शिक्षा दिलवानी है, अब उनकी शादी करनी है इस चक्रव्यूह में इंसान फंसा है जब वो बच्चे बड़े हो कर शादी करते है उनके बच्चे होते है वो भी इसी चक्रव्यूह में फंसते जाते है और ये चक्र बस चलता ही रहता है अपने बच्चो के लिए ही सब जीते है और ये जीना इतना एक आयामी है कि सिर्फ बच्चे ही दिखते है जीवन के दूसरे आयामों पर तो नज़र जाती ही नहीं | खुद की इच्छायों का तो गला घोटते है अपने बजुर्गो की भी अनदेखी करते है बच्चों की जिम्मेदारी अधिक है इसलिए बजुर्ग बोझ लगने लगते है
ऐसा एक घटना की चर्चा करना चाहूंगी जब एक इकलौता बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ दूसरे शहर में यह कह कर शिफ्ट हो गया कि ऑफिस से घर दूर पड़ता है जबकि उनके पिता ने वो घर जो कि एक बहुत ही महंगी सोसाइटी में तीन मंज़िल का पेंटहाउस था उनकी मर्ज़ी से ही लिया था लेकिन घर लेने के छः माह में माता जी को ब्रेन हेमरेज हो गया और वो बेटा अपनी पत्नी बच्चो के साथ शिफ्ट हो गया | उसने ये नहीं सोचा कि बूढ़ा पिता कैसे अकेले सेवा करेगा | खैर पिता ने नर्स और आया के साथ पत्नी की दो साल अच्छी सेवा की | लेकिन कुदरत का कहर देखिये कि माँ की मृत्यु को अभी दो माह ही हुए थे उस पुत्र की तीन साल की बच्ची को ब्लड कैंसर हो गया | तब वो पिता के पैरो में लोट लोट के रोया कि मैंने माँ की सेवा नहीं की इसका फल मिला | अब माँ को तो वो छोड़ कर चला गया अपने बच्चे से कैसे मुँह मोड़ेगा | पिता ने भी इलाज में यथा संभव आर्थिक मदद करी |
जीवनभर का सामाजिक निवेश ही सच्चा सुरक्षा कवच
समस्या का हल केवल वृद्धाश्रम या हेल्पलाइन नहीं हो सकते। यह एक सांस्कृतिक एवं सामाजिक सुधार की माँग करता है। हमें अपनी सोच और जीवनशैली के ढांचे को बदलना होगा। और इस बदलाव की शुरुआत युवावस्था से ही करनी होगी।
“सारे अंडे एक टोकरी में” — जीवन का बड़ा सबक
यहाँ मैं वित्तीय योजना सलाह का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र का उल्लेख करना चाहूंगी जो कहता है कि सारे अंडे एक ही टोकरी में न रखें |
यह वैसा ही है जैसे कोई निवेशक अपना सारा निवेश एक ही स्टॉक में लगाता है जोखिम बहुत ज़्यादा हो जाता है। उसी तरह अगर हम अपने रिश्तों का पूरा भरोसा केवल अपने बच्चों पर और खून के रिश्तों पर रखें और समाज में कोई “भावनात्मक पोर्टफोलियो” न बनाएं, तो बुढ़ापा जोखिम में पड़ जाएगा।
आपको अवतार मूवी में सचिन का किरदार ‘सेवक ‘ याद होगा या फिर बाग़बान मूवी में सलमान का किरदार “अलोक मल्होत्रा’ तो याद होगा
इन दोनों फिल्मो को केवल एक भावनात्मक कहानी मानना इनमे दिए हुए सामाजिक संदेश को कम आंकना होगा। यह फिल्म दर्शाती है कि एक माता-पिता अपने पूरे जीवन को बच्चों के लिए न्योछावर करते हैं, और जब वही बुज़ुर्ग अवस्था आती है, तो बच्चे उन्हें बोझ समझकर उनसे दूरी बना लेते हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
जब सबने मुँह मोड़ा, तब सेवक/आलोक सामने आते है। वह कोई खून के रिश्ते नहीं थे, बल्कि एक ऐसे बच्चे थे जिन्हे कभी उन बुज़ुर्गों ने बिना किसी अपेक्षा के मदद की थी। सालों बाद वही युवक उनके जीवन का सबसे मजबूत सहारा बनते है
इसमें सेवक/आलोक एक रूपक (metaphor) है इनको आप समाज के समानार्थ में समझ सकते है | जब हम अपने बच्चों के साथ साथ समाज में भी निवेश करते है तो ये बिलकुल ऐसा है जैसा कि अपने वित्तीय पोर्टफोलियो में विविधता (diversify) लाना |
अभी आप जवान है तो समाज में अपना योगदान दीजिये | कुछ ऐसे लोगो को सक्षम बनाने में उनकी मदद कीजिये जो काबिल है और आपकी थोड़ी से मार्गदर्शन से या फिर थोड़ी आर्थिक सहायता से अपने जीवन में अच्छा कर सकते है |
उदहारण के लिए किसी बेरोज़गार और आर्थिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति को कोई छोटा सा कारोबार चलाने में सहायता देना |
यदि आप शिक्षित महिला है तो दूसरी महिलायों को किसी गृह उद्योग की जानकारी देना और घर से अपने छोटे से काम को कैसे चलाया जाये, का ज्ञान देना |
आर्थिक रूप से कमजोर लोगो को वित्तीय प्रबंधन एवं छोटी छोटी बचत करना सीखाना |
कभी समय मिले तो पास की बस्ती में जा कर छोटे बच्चो और महिलाओं को पढ़ाना, युवाओं से बात करना और सही दिशा दिखाना इतियादी इतियादी ऐसे बहुत से मौके है जो आप अपने आस पास पाएंगे जब आप बहुआयामी होकर अपने चारों तरफ देखेंगे |
ये छोटे छोटे निवेश कब आपकी बड़ी पूँजी बन जायेंगे आपको पता भी नहीं चलेगा और जब आप अपनी नौकरी से रिटायर होंगे तो न काम की कमी नहीं होगी न ही लोगों की |
समाज में निवेश: एक प्रेरणादायक वास्तविक उदाहरण
एक महिला उद्यमी को मैं जानती हूँ उन्होंने ने अपने व्यवसाय में काम करने वाले कर्मचारियों को सिर्फ वर्कर्स नहीं, परिवार का हिस्सा माना। क्योँकि उनके वर्कर्स दूर के राज्यों से काम करने आते है और साक्षर नहीं थे उन्होंने उनके बैंक अकाउंट खुलवाए, वित्तीय जानकारी दी उनके बच्चो के लिए छोटी बचत के लम्बी अवधि के खाते खुलवाए | उन्हें साफ़ सुथरे तरीके से रहने के लिए प्रेरित किया | अच्छा साफ़ सुथरा पहनो, सादा खाओ पर अच्छा खाना खाओ, आत्म सम्मान के साथ जियो | जानवरों से प्रेम करो | कुत्ते, बिल्लिओं और आवारा पशुओं के यथासंभव देखभाल करो |
वर्षों बाद, ये कर्मचारी उनकी बुढ़ापे के साथी है | सारा बिज़नेस भी अच्छे से चला रहे है उनके खाने पीने का पूरा ध्यान रखते है वे सिर्फ उन्हें गाइडेंस देती है सुपरवाइज़ करती है सब एक बड़े परिवार की तरह है उनके बच्चे निश्चिंत हो कर अपना करियर बना रहे है वो अपनी माँ से प्यार करते है लेकिन वे निश्चित है कि माँ अकेली नहीं है | । आज वे अकेली नहीं हैं, उन्होंने समाज में निवेश किया और अपने लिए एक बड़ा परिवार बना लिया जहाँ वे 15-20 लोगो को उनके परिवार को चलाने का जरिया भी बनी है इसलिए रिश्तों को डाइवर्सिफाई करें, सामाजिक पोर्टफोलियो बनाएं
अगर आप चाहते हैं कि बुढ़ापे में अकेले न रहें:
- किसी सेवा संस्था, महिला मंडल, समुदाय से जुड़ें
- भावनात्मक बीमा के रूप में लोगों की मदद करें
- कार्यस्थल को परिवार बनाएं, और वहां के लोगों में आत्मनिर्भरता जगाएं
- बच्चों के अलावा, समाज में भी समय, ऊर्जा और मूल्य का निवेश करें
यही वह “संपत्ति” है जो बुढ़ापे में ब्याज सहित लौटती है।
अंत में यही कहना चाहूंगी कि बुढ़ापा एकांत का नहीं, अनुभव का उत्सव होना चाहिए
अकेलापन कोई अचानक आई विपत्ति नहीं है,वह हमारे जीवन के उन निर्णयों का फल है जो हमने वर्षों पहले लिए थे।यदि हम जीवनभर केवल अपनों तक सीमित रहे, समाज से अलग-थलग रहे, सेवा से दूर रहे तो हो सकता है कि बुढ़ापा एक अंधकारमय गलियारा बन जाए |
लेकिन अगर हमने दूसरों के लिए कुछ किया, मानवीय रिश्ते बनाए, समाज में बिना स्वार्थ के निवेश किया तो वह बुढ़ापा अकेलापन नहीं देगा, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और सार्थकता से भरा होगा।
अब ज़रूरत है सोच बदलने की। आगे देखने के साथ साथ एक नज़र खुद पर डालें, फिर पीछे अपने बजुर्गों पर, फिर अपने दाएं एवं बाएं अर्थात अपने आस पास के लोगो को देखे | संवेदनशील बने | बुज़ुर्गों को सहानुभूति नहीं, सम्मान दें। उनकी देखभाल को दया नहीं, कर्तव्य मानें और अपने भविष्य के लिए आज से समाज में निवेश करें क्योंकि इस से बेहतर रिटर्न की सम्भावना अधिक है |
आज समाज को संगठन की जरूरत है क्योँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और हम मनुष्य है हमें भी समाज की उतनी ही जरूरत है जितनी समाज को हमारी | आप जड़ की फ़िक्र करो पेड़ अपने आप हरा हो जायेगा |
खुश रहें | आपकी हर इच्छा पूरी हो तथास्तु
अति सुंदर। बच्चे, जवान ,बुजुर्ग और समाज सभी के लिए प्रेरणादायक सीख और दर्पण।
बहुत सुंदर लिखा है | बहुत अच्छे से समझाया है | ❤️
Beautifully expounded..
विचारपूर्ण आलेख। सार्थक और उपयोगी भी।
यह आर्टिकल आज की सामाजिक दशा को समझा रहा है, जो की बहुत चिंता का विषय है, इसलिए बुजुर्गो के प्रति हमे हमारी सोच बदलनी होगी, तभी समाज का कल्याण संभव है,